
एक समय की बात है… बहुत साल पहले, एक छोटे से गाँव में एक श्रद्धालु ब्राह्मण रहते थे — विष्णुदत्त शर्मा। वो अपनी पत्नी के साथ सरल जीवन जीते थे — पर उनके जीवन का केंद्र था भगवान दत्तात्रेय की भक्ति। हर सुबह, विष्णुदत्त जी भगवान दत्तात्रेय की पवित्र पादुकाओं की अत्यंत श्रद्धा से पूजा करते। वो उन्हें जल से स्नान कराते, और वह पवित्र जल अपने आँगन में स्थित पीपल वृक्ष को अर्पित करते।यह उनका नित्य नियम था — जो उन्होंने जीवन में कभी नहीं छोड़ा। पर उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि उसी पीपल वृक्ष पर एक अदृश्य ब्रह्मराक्षस वास करता है। वो उस पवित्र जल को पीकर शुद्ध हो रहा था। विष्णुदत्त की भक्ति से और पादुका के चरणामृत से उसका अंधकार मिट रहा था।
एक दिन जल अर्पित करते समय वह ब्रह्मराक्षस प्रकट हुआ। उसने कहा, “हे ब्राह्मण! तुम्हारी भक्ति ने मुझे मुक्त कर दिया है। अब मैं तुम्हें एक वरदान देना चाहता हूँ।” विष्णुदत्त जी जो की सनातनी ब्राह्मण थे भगवान दत्तात्रेय की उपासना के साथ वे गृहस्थ जीवन मे शक्ति की उपासन और उनके बल के महत्व को अच्छी तरह से जानते थे उन्होंने अपनी पत्नी से परामर्श किया तो उन्होंने रास्ता बताया और कहा की —“हमें कोई भौतिक वरदान नहीं चाहिए।
हमारी केवल एक ही इच्छा है — भगवान दत्तात्रेय के साक्षात् दर्शन। उसी जगह अगर कोई और स्त्री होती तो न जाने कैसे कैसे भौतिक वरदान मांगने को कहती। क्युकी वे दोनों पती पत्नी गरीबी मे भी यक दूसरे के साथ से आध्यात्मिक रास्ते मे आगे बढ़ रहे थे तो उन्हे भगवान के दर्शन के अलावा कोई दूसरी चीज सूजी ही नहीं। ” ब्रह्मराक्षस ने यह सुनकर बडा खुश हुआ उसने बताया की मे आपको दूर से दिखा सकता हु की वो भगवान दत्तात्रेय है मे उनके पास नहीं जा सकता क्युकी मे अभी भी राक्षस योनि मे हु।
एक बार उस ब्रम्हरक्षस ने दिखया तो भगवान एक साधारण भिक्षुक के रूप में थे । तो विष्णुदत्त को विश्वास नहीं हुआ उन्हे लगा की भगवान ऐसे थोड़ी न हो सकते है। वे तो तीन मस्तक छह भुजाओ वाले है। विष्णुदत्त अभी भी साकार उपासना मे थे भगवान के स्वरूप को पहचान न सके। वही दूसरी तरफ वह ब्रह्मराक्षस और विष्णूदत्त की पत्नी दोनों ही समजा रहे है की ये प्रभु की लीला है आपको तो बस उनके पैर पकड़ लेने है। विष्णूदत्त को भी लगा की उस से बहोत बड़ी गलती हो गई है। उसने तय किया की ऐसी गलती वो कभी नहीं करेगा और ब्रह्मराक्षस से फिर से विनती किए की उसे यक मौका और दे । ब्रह्मराक्षस ने चेतावनी दिया की मे जिसे दिखाउ उसके पैर पकड़ लेना अबकी बार भगवान को खो ने की गलती मत करना, विष्णूदत्त सहमत हुए।
दूसरी बार, ब्रह्मराक्षस के पीछे पीछे गए ब्रह्मराक्षस ने जिसे दिखाया वो देख के विष्णूदत्त और आघातजनक स्थिति मे पद गए। विष्णूदत्त ने जिसे दिखाया की वे रहे प्रभु वो तो ऐसे स्वरूप लिए थे की नशेड़ियों की बस्ती मे कोने मे पड़े मदिरा पान कर रहे थे। विष्णूदत्त को गुस्सा आया की ये मेरे प्रभु ऐसे हो ही नहीं सकते ब्रह्मराक्षस को कोई गलत फहमी हुई है। लेकिन नहीं वो समजा रहे है की यही ईश्वर है जाओ उनके पास लेकिन विष्णूदत्त जिस स्थिति मे थे उन्हे फिर से विश्वास नहीं हुआ ऐसे अपमानजनक व्यक्ति भगवान कैसे हो सकते है। वे उस स्थान से वापस या गए और पत्नी को सारी बात बताई । फिर से उन्हे समजाया की ये सिर्फ दत्तात्रेय प्रभु लीला कर रहे और हमारी परीक्षा ले रहे है। तीसरी बार — श्मशान में, एक खप्परधारी तपस्वी के रूप में प्रकट हुए।
पहली दो बार विष्णुदत्त उन्हें पहचान न सके, पर तीसरी बार… जब वह भयानक रूप देखा, तो उनके भीतर भक्ति का प्रकाश जागा। वो भगवान के चरणों में गिर पड़े और बोले — “मैं जानता हूँ, आप ही हमारे प्रभु हैं… मुझे क्षमा करें।”
तभी वहाँ एक तेजस्वी प्रकाश फैला — और भगवान दत्तात्रेय अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हो गए। और वरदान मांगने को कहा ।
वे इतने भोले और सरल थे की की क्या मांगे वो सूज नहीं रहा था तभी वो ब्रह्मराक्षस ने दूर से बताया की भगवान को अपने घर प्रसाद पाने के लिए आमंत्रित करे विष्णुदत्त ने वैसे ही प्रार्थना किया की प्रभु आप मेरे भर भोजन ग्रहण करने पधारिए । भगवान ने कहा — “मैं भोजन तभी करूंगा, जब मेरे साथ दो और देव हाजिर रहेंगे ” ब्रह्मराक्षस ने इशारे से हा बोलने को कहा।
दूसरे दिन विष्णुदत्त और उनकी पत्नी चिंतित थे की दूसरे देव को कैसे आमंत्रित करे तभी ब्रह्मराक्षस ने दोनों पति पत्नी को ये महसूस कराया की इतने सालों की साधना के चलते आप पूरी श्रद्धा से हाथ मे जल लेके भगवान का आह्वान कीजिए वो जरूर आएंगे ।
वैसे ही विष्णुदत्त की पत्नी ने हाथ मे जल लेके आग्निदेव को आह्वान किया तो तुरंत ही प्रगट हुए और वैसे ही सूर्यदेव को आह्वान किए तो वो भी प्रगट हुए । विष्णुदत्त और उनकी पत्नी ने श्रद्धा से दोनों देवताओं को आमंत्रित किया।
और एक चमत्कार हुआ दत्तात्रेय प्रभु भी आ गए — तीनों देवता उनके घर भोजन के लिए पधारे। भोजन के बाद, विष्णुदत्त ने हाथ जोड़कर तीन प्रार्थनाएँ कीं —
1.अपने कुल की मुक्ति, 2. अपनी पत्नी का कल्याण, और 3. उस ब्रह्मराक्षस का मोक्ष।
भगवान दत्तात्रेय मुस्कुराए और बोले — “जहाँ हमने भोजन किया है, वही जल और बचा हुआ अंश उस पीपल वृक्ष को अर्पित करो।” विष्णुदत्त ने वैसा ही किया। और जैसे ही वह अर्पण किया गया — ब्रह्मराक्षस को तुरंत मोक्ष प्राप्त हो गया।
उस क्षण, सारा वातावरण शांत और पवित्र हो गया। मानो स्वयं भगवान ने वहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज की हो। यह कथा हमें सिखाती है — कि सच्ची भक्ति और श्रद्धा कभी व्यर्थ नहीं जाती। जब मन शुद्ध होता है और भाव सच्चे होते हैं — तो ईश्वर स्वयं हमारे जीवन में प्रकट होते हैं।